प्राचीन भारत का इतिहास
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Explaination :- गुजरात के लोथल के सरागवाला गाँव से 80 km दूर से हड़प्पा सभ्यता के प्रमाण मिले हैं जो अहमदाबाद जिला में भोगवा नदी पर अवस्थित है।
● लोथल की खोज 1953 -1956 ई0 में रंगनाथ राव द्वारा किया गया।
● लोथल से बंदरगाह, युगल, शवाधान, हवनकुंड, चावल, फारस की मोहर आदि का प्रमाण मिलता है।
● कालीबंगन - राजस्थान के गंगानगर जिला में घग्घर नहीं पर अवस्थित हैं , जिसकी खोज 1953 ई0 में वि. वी. लाल और वी. के. थापर द्वारा की गई।
● कालीबंगन में हवनकुंड तथा बलि प्रथा, जोते हुए खेल (हल के साक्ष्य), अलंकृत ईंट और भू-कम्पन के प्रमाण मिले हैं।
● द्वारिका का संबंध श्रीकृष्ण - विष्णु अवतार से है।
● अरिकामेडू से रोमन बस्ती का प्रमाण मिला है। भारत और रोम से व्यापार का भी प्रमाण मिला है।
● व्यापार भारत के पक्ष में थे।
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Explaination :- टेराकोटा द्रव्य का प्रयोग हड़प्पा-काल की मुद्राओं के निर्माण में मुख्यत: हुई है।
● टेराकोटा-मिट्टी की पकी हुई मुद्राओं (मूर्तियों) को कहा गया है।
● कांस्य में 9:1 में तांबा एवं टीन का प्रयोग होता है।
● तांबा का प्रयोग हड़प्पावासी करते थे।
● लोहे का ज्ञान हड़प्पावासी को नहीं था।
● जबकि मुहरों के बनाने में सर्वाधिक उपयोग सेलखड़ी का किया गया है। सैंधव मुहरें वेलनाकार, वर्गाकार, आयताकार एवं वृत्ताकार हैं।
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Explaination :- मराठा राज्य का दूसरा प्रवर्तक बालाजी विश्वनाथ (1713- 1720 ई0) को माना जाता है।
● बालाजी विश्वनाथ चित्तपावन ब्राहमण थे।
● 1708 ई0 शाहू जी महाराज ने इन्हें सेनाकर्ता बनाया।
● 1713 ई0 में इन्हें पेशवा पद पर नियुक्त किया।
● पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी, 1761 को मराठा और अब्दाली (अफगान) के बीच हुआ।
● पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों की भारी पराजय हुई।
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Explaination :- साँची का सबसे बड़ा बौद्ध स्त्तूप है।
● साँची के स्तूप का निर्माण अशोक ने कराया।
● साँची मध्य प्रदेश के रायसेन जिला में अवस्थित है।
● बौद्ध साहित्य के अनुसार अशोक ने 84,स्तूपों का निर्माण करवाया।
● अमरावती स्तूप का संबंध शुंग वंश से है।
● स्तूप जहाँ बुद्ध के अवशेष रखे जाते थे।
● चैत्य-पूजागृह बौद्ध धर्म का है।
● मठ जहाँ बौध भिक्षु-भिक्षुणी वर्ष के महीनों में निवास करते थे।
● कार्ले का चैत्य भारत में सबसे बड़ा चैत्य हैं।
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Explaination :- चालुक्य वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक पुलकेशिन II (610- 11 642 AD) था।
● पुलकेशिन II ने हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर पराजित किया।
● पल्लव वंश के नरसिंहम वर्मन ने 642 ई. में वातापी पर अधिकार कर लिया और पुलकेशिन II की हत्या कर दी।
● भारत में चार चालुक्य वंशो की शाखा थीं।
● वातापी के चालुक्य के संस्थापक जयसिंह थे। राजधानी वातापी।
● कल्याणी के चालुक्य के संस्थापक तैलप II थे। राजधानी मान्यखीट।
● अंहिलवाड के चालुक्य वंश के संस्थापक मूलराज थे।
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Explaination :- 323 ई.पू. में सिकन्दर महान की मृत्यु बेबीलोन में हुई।
● कहा जाता है कि मालवा जनजाति से युद्ध में घायल हो गये थे।
● सिकन्दर मकदूनिया का शासक था। फिलिप का पुत्र था।
● सिकन्दर के सेनापति सेल्युकश निकेटर था।
● नौ सेनापति नियार्कस।
● निकेटर का अर्थ ' विजेता ' होता है।
● सिकन्दर ने भारत के झेलम क्षेत्र के शासक पोरस को हाईस्पेशीज के युद्ध में पराजित किया।
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Explaination :- चन्द्रगुप्त द्वितीय (375 -414 ई.)
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Explaination :- 'ताँबा' गुलाबी रंग और लाल रंग की एक चमकदार धातु है। यह चाँदी के अतिरिक्त विद्युत की सबसे अच्छी सुचालक है। विद्युत सुचालक होने के कारण इसका प्रयोग विद्युत यंत्र 'कैलोरीमीटर' आदि बनाने में किया जाता है। भारत में ताँबे का प्रयोग काफ़ी लम्बे समय से किया जाता रहा है। वैदिक काल में इसका प्रथमत: प्रयोग किया गया था। झारखण्ड राज्य का सिंहभूमि ज़िला ताँबा उत्खनन की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यहाँ से उड़ीसा राज्य तक लगभग 140 कि.मी. लम्बी पट्टी में ताँबा मिलता है। राजस्थान का खेतड़ी ताँबा क्षेत्र सिन्धु घाटी सभ्यता काल से ही ताँबा उत्खनन का प्रमुख क्षेत्र रहा है।
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Explaination :- कृष्णदेव राय' (1509-1529 ई.) तुलुव वंश के वीर नरसिंह का अनुज था, जो 8 अगस्त, 1509 ई. को विजयनगर साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। उसके शासन काल में विजयनगर ऐश्वर्य एवं शक्ति के दृष्टिकोण से अपने चरमोत्कर्ष पर था। कृष्णदेव राय का शासन काल 'तेलुगु साहित्य का क्लासिकी युग' माना जाता है। उसके दरबार को तेलुगु के आठ महान् विद्वान् एवं कवि, जिन्हें अष्ट दिग्गज कहा जाता था, सुशोभित करते थे। अत: उसे 'आन्ध्र भोज' कहकर भी पुकारा जाता था। 'अष्ट दिग्गज' में सर्वाधिक महत्वपूर्ण अल्लसानि पेद्दन को 'तेलुगु कविता का पितामह' की उपाधि प्रदान की गई थी। उसकी मुख्य कृति है- ‘स्वारोचिष-सम्भव’ या 'मनुचरित' तथा ‘हरिकथा सार’।
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Explaination :- बौद्ध संगीति का तात्पर्य उस';संगोष्ठी' या';सम्मेलन' या';महासभा' से है, जो महात्मा बुद्ध के परिनिर्वाण के अल्प समय के पश्चात् से ही उनके उपदेशों को संग्रहीत करने, उनका पाठ (वाचन) करने आदि के उद्देश्य से सम्बन्धित थी। इन संगीतियों को प्राय:';धम्म संगीति' (धर्म संगीति) कहा जाता था। संगीति का अर्थ होता है कि';साथ-साथ गाना'। इतिहास में चार बौद्ध संगीतियों का उल्लेख हुआ है-
प्रथम बौद्ध संगीति - (483 ई.पू., राजगृह में)
द्वितीय बौद्ध संगीति - (वैशाली में)
तृतीय बौद्ध संगीति - (249 ई.पू., पाटलीपुत्र में)
चतुर्थ बौद्ध संगीति - (कश्मीर में)
चतुर्थ बौद्ध संगीति, जिसे अंतिम बौद्ध संगीति माना जाता है, का आयोजन कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल (लगभग 120-144 ई.) में हुई। यह संगीति कश्मीर के';कुण्डलवन' में आयोजित की गई थी। इस संगीति के अध्यक्ष वसुमित्र एवं उपाध्यक्ष अश्वघोष थे।
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Explaination :- भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता और प्रचलन 'मनुस्मृति' का ही है। इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव हैं। यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है।
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Explaination :- क्रीट की सभ्यता प्राचीन यूनानी सभ्यता की जननी कही जाती है।
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Explaination :- 'चौसा का युद्ध' भारतीय इतिहास में लड़े गये महत्त्वपूर्ण युद्धों में से एक है। यह युद्ध 26 जून, 1539 ई. को मुग़ल बादशाह बाबर के पुत्र हुमायूँ एवं शेर ख़ाँ (शेरशाह सूरी) की सेनाओं के मध्य गंगा नदी के उत्तरी तट पर स्थित 'चौसा' नामक स्थान पर लड़ा गया था। चौसा का यह महत्त्वपूर्ण युद्ध हुमायूँ अपनी कुछ ग़लतियों के कारण हार गया। युद्ध में मुग़ल सेना की काफ़ी तबाही हुई और उसे बहुत नुकसान उठाना पड़ा।
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Explaination :- मगध क्षेत्र में खेती की उपज खास तौर पर अच्छी होती थी। लोहे की खदानें भी आसानी से उपलब्ध थी, जिससे उपकरण तथा हथियार बनाना सरल होता था। जंगली क्षेत्रों में हाथी उपलब्ध थे, जो सेना के लिये महत्त्वपूर्ण थे। गंगा तथा इसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता व सुलभ होता था।
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Explaination :- उपर्युक्त सिद्धांत जैन धर्म से संबंधित हैं।
इसकी सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा यह है कि संपूर्ण विश्व प्राणवान है। अहिंसा इस धर्म का केंद्र बिंदु है।
जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है, कर्म के चक्र से मुक्ति के लिये त्याग और तपस्या की ज़रूरत होती है जो संसार के त्याग से ही संभव है। इसलिये मुक्ति के लिये विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया।
जैन भिक्षु तथा भिक्षुणी पाँच व्रतों पर विश्वास करते थे- हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य (अमृषा) और धन संग्रह न करना।
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Explaination :- इसमें संदेह नहीं कि अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी था। सभी बौद्ध ग्रंथ अशोक को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताते हैं। अशोक के बौद्ध होने के सबल प्रमाण उसके अभिलेख हैं। अपने राज्याभिषेक से सम्बद्ध लघु शिलालेख में अशोक ने अपने को 'बुद्धशाक्य' कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि वह ढाई वर्ष तक एक साधारण उपासक रहा। राज्याभिषेक के दसवें वर्ष में अशोक ने बोध गया की यात्रा की, बारहवें वर्ष वह निगालि सागर गया और कोनगमन बुद्ध के स्तूप के आकार को दोगुना किया। महावंश तथा दीपवंश के अनुसार उसने तृतीय बौद्ध संगीति भी बुलाई थी।
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Explaination :- कालीबंगन सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रमुख स्थल है। यहां से ऊँटो की हड्डियाँ, अग्निवेदिकाएँ, जुते हुए खेत आदि प्रमुख साक्ष्य प्राप्त हुए हैं।
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Explaination :- पुनर्जागरण काल में ग्रीको-रोमन प्राचीन अध्ययन में रूचि को मानववाद नाम से जाना गया है।
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Explaination :- 'कपास' भारत की आदि फ़सल है, जिसकी खेती बहुत बड़ी मात्रा में की जाती है। भारत में इसका इतिहास काफ़ी पुराना है। हड़प्पा निवासी कपास के उत्पादन में संसार भर में प्रथम माने जाते थे। कपास उनके प्रमुख उत्पादनों में से एक था। भारत से ही 327 ई.पू. के लगभग यूनान में इस पौधे का प्रचार हुआ। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत से ही यह पौधा चीन और विश्व के अन्य देशों को ले जाया गया। विश्व में प्रतिवर्ष लगभग 150 लाख मीट्रिक टन कपास पैदा होता है। संयुक्त राज्य अमरीका, चीन, भारत, ब्राज़ील, मिस्र, सूडान आदि कपास के प्रमुख उत्पादक देश हैं।
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Explaination :- नालंदा में बौद्ध धर्म के अतिरिक्त 'हेतुविद्या', 'शब्दविद्या', 'चिकित्सा शास्त्र', अथर्ववेद तथा सांख्य दर्शन से संबंधित विषय भी पढ़ाए जाते थे। युवानच्वांग ने लिखा था कि, 'नालंदा के एक सहस्त्र विद्वान् आचार्यों में से सौ ऐसे थे, जो सूत्र और शास्त्र जानते थे। पांच सौ, 3 विषयों में पारंगत थे, और बीस, 50 विषयों में। केवल शीलभद्र ही ऐसे थे, जिनकी सभी विषयों में समान गति थी।
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Explaination :- प्राचीनता एवं ऐतिहासिकता की दृष्टि से गुजरात, भारत का अत्यंत महत्त्वपूर्ण राज्य है। इसकी उत्तरी-पश्चिमी सीमा पाकिस्तान से लगी है। गुजरात का क्षेत्रफल 1,96,024 वर्ग किलोमीटर है। यहाँ मिले पुरातात्विक अवशेषों से प्राप्त जानकारी के अनुसार इस राज्य में मानव सभ्यता का विकास 5 हज़ार वर्ष पहले हो चुका था। कहा जाता है कि ई. पू. 2500 वर्ष पहले पंजाब से हड़प्पा वासियों ने कच्छ का रण पार कर नर्मदा की उपत्यका में मौजूदा गुजरात की नींव डाली थी। गुजरात ई. पू. तीसरी शताब्दी में मौर्य साम्राज्य में शामिल था। कुवांशी नाम का गाँव, जो कि गुजरात के मोरवी शहर से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, यहाँ से 4, वर्ष पुरानी सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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Explaination :- मौर्य सम्राट अशोक के इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। यह माना जाता है कि अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक 'डेरियस' से मिली थी। अशोक के लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं। सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में लिखित सन्देश को सर्वप्रथम एलेग्जेंडर कनिंघम के सहकर्मी जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था। मौर्य काल की शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों के अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अशोक का धम्म व्यावहारिक फलमूलक (अर्थात् फल को दृष्टि में रखने वाला) और अत्यधिक मानवीय था।
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Explaination :- भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा-बहराइच ज़िलों की सीमा पर श्रावस्ती बौद्ध तीर्थ स्थान है। गोंडा-बलरामपुर से 12 मील पश्चिम में आधुनिक सहेत-महेत गाँव ही श्रावस्ती है। पहले यह कौशल देश की दूसरी राजधानी थी। भगवान राम के पुत्र लव ने इसे अपनी राजधानी बनाया था। श्रावस्ती बौद्ध और जैन दोनों का तीर्थ स्थान है। तथागत श्रावस्ती में रहे थे। यहाँ के श्रेष्ठी अनाथपिण्डिक ने भगवान बुद्ध के लिये जेतवन बिहार बनवाया था। आजकल यहाँ बौद्ध धर्मशाला, मठ और मन्दिर है।
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Explaination :- कन्नौज का राजा जयचन्द्र पृथ्वीराज चौहान की वृद्धि के कारण उससे ईर्ष्या करने लगा था। वह उसका विद्वेषी हो गया था। उन युद्धों से पहले पृथ्वीराज कई हिन्दू राजाओं से लड़ाइयाँ कर चुका था। चंदेल राजाओं को पराजित करने में उसे अपने कई विख्यात सेनानायकों और वीरों को खोना पड़ा था। जयचंद्र के साथ होने वाले संघर्ष में भी उसके बहुत से वीरों की हानि हुई थी।
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Explaination :- लोथल गुजरात के अहमदाबाद ज़िले में भोगावा नदी के किनारे 'सरगवाला' नामक ग्राम के समीप स्थित है। यहाँ की खुदाई 1954-1955 ई. में रंगनाथ राव के नेतृत्व में की गई थी। लोथल से समकालीन सभ्यता के पांच स्तर पाए गए हैं। इसके उत्तर में 12 मीटर चौड़ा एक प्रवेश द्वार निर्मित था, जिससे होकर जहाज़ आते-जाते थे और दक्षिण दीवार में अतिरिक्त जल के लिए निकास द्वार था। लोथल में गढ़ी और नगर दोनों एक ही रक्षा प्राचीर से घिरे हैं। यहाँ से अन्य अवशेषों में चावल, फ़ारस की मुहरों एवं घोड़ों की लघु मृण्मूर्तियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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Explaination :- सम्राट अशोक के इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। यह माना जाता है कि अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक 'डेरियस' से मिली थी। अशोक के लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं। अशोक के शिलालेखों और स्तम्भ लेखों को दो उप श्रेणियों में रखा जाता है। 14 शिलालेख सिलसिलेवार हैं, जिनको 'चतुर्दश शिलालेख' कहा जाता है। ये शिलालेख शाहबाजगढ़ी, मानसेरा, कालसी, गिरनार, सोपारा, धौली और जौगढ़ में मिले हैं। कुछ फुटकर शिलालेख असम्बद्ध रूप में हैं और संक्षिप्त हैं। शायद इसीलिए उन्हें 'लघु शिलालेख' कहा जाता है।
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Explaination :- बिहार के भागलपुर ज़िले में स्थित सुल्तानगंज से एक विशाल गुप्त काल की बौद्ध प्रतिमा मिली है, जो काँसे से निर्मित है। वर्तमान में यह प्रतिमा बर्किघम, इंग्लैण्ड के संग्रहालय में सुरक्षित है। महात्मा बुद्ध की यह प्रतिमा दो टन से भी अधिक भारी तथा दो मीटर ऊँची है।
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Explaination :- दक्षिण भारत के इतिहास के अन्तर्गत चालुक्य एवं पल्लवों के इतिहास का अध्ययन 550 ई. के मध्य। अरबों का सिन्ध पर आक्रमण एवं उसके भारतीय इतिहास पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन। राजपूतों की उत्पत्ति के अन्तर्गत हर्ष के बाद की सभी शक्तियों का अध्ययन। 'त्रिपक्षीय संघर्ष' में प्रतिहार, पाल एवं राष्ट्रकूट की भूमिका अध्ययन
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Explaination :- चन्द्रगुप्त प्रथम (319-335 ई.) भारतीय इतिहास के सर्वाधिक प्रसिद्ध राजाओं में से एक था। वह गुप्त शासक घटोत्कच का पुत्र था। चन्द्रगुप्त ने एक 'गुप्त संवत' (319-320 ई.) चलाया, कदाचित इसी तिथि को चंद्रगुप्त प्रथम का राज्याभिषेक हुआ था। चंद्रगुप्त ने, जिसका शासन पहले मगध के कुछ भागों तक सीमित था, अपने राज्य का विस्तार इलाहाबाद तक किया। 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण करके इसने पाटलिपुत्र को अपनी राजधानी बनाया था
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Explaination :- प्राचीन काल के ज्योतिर्विदों में आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, आर्यभट द्वितीय, भास्कराचार्य, कमलाकर जैसे प्रसिद्ध विद्वानों का इस क्षेत्र में अमूल्य योगदान है। इन सभी में आर्यभट सर्वाधिक प्रख्यात हैं। वे गुप्त काल के प्रमुख ज्योतिर्विद थे। आर्यभट का जन्म ई.स. 476 में कुसुमपुर (पटना) में हुआ था। नालन्दा विश्वविद्यालय में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी। 23 वर्ष की आयु में आर्यभट ने 'आर्यभटीय ग्रंथ' लिखा था। उनके इस ग्रंथ को चारों ओर से स्वीकृति मिली थी, जिससे प्रभावित होकर राजा बुद्धगुप्त ने आर्यभट को नालन्दा विश्वविद्यालय का प्रमुख बना दिया।.

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